प्रांत स्तरीय घोष प्रतियोगिता - 2026
घोष रत्नावली
संचलन के समय शारीरिक विभाग ने इस बात पर विचार किया कि यदि संचलन के साथ घोष वाद्य का प्रयोग किया जाए तो इसकी रोचकता, एकरूपता और उत्साह में चमत्कारिक परिवर्तन हो सकता है। स्वयंसेवकों की इच्छा शक्ति का ही परिणाम था कि संघ स्थापना के केवल दो वर्षों बाद 1927 में शारीरिक विभाग में घोष भी शामिल हो गया। स्वयंसेवकों ने शंख, वंशी, आनक जैसे वाद्य यंत्रों पर अभ्यास आरंभ किया। इन वाद्यों पर ऐसी रचनाएँ तैयार की, जिनमें अपने देश की नाद परंपरा की सुगंध हो। गौरव की बात है कि स्वयंसेवकों ने घोष वाद्यों को भी स्वदेशी नाम प्रदान कर उन्हें अपनी संगीत परंपरा के अनुकूल बनाकर उनका भारतीयकरण किया। इस क्रम में साइड ड्रम को आनक, बॉस ड्रम को पणव, ट्रायंगल को त्रिभुज, बिगुल को शंख आदि नाम दिए गए जो कि ढोल, मृदंग आदि नामों की परंपरा में ही समाहित होते हैं। परंपरागत वाद्य शंख, आनक और वंशी से आरंभ हुई घोष यात्रा आज नागांग, स्वरद आदि अत्याधुनिक वाद्यों पर मौलिक रचनाओं के मधुर वादन तक पहुँच गई है। विद्या भारती विद्यालयों में सतत प्रवास योजना करके घोष वादकों में निपुणता और दक्षता की दृष्टि से घोष वर्ग और शिविरों के माध्यम से मध्य भारत प्रांत में कुशल घोष वादक तैयार किये गए है।